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| जेईई में पासआउट सुमित-अमित के पिता जितेंद्र कुमार बेटों की सफलता के बाद कुछ यूं मुस्कुराते हुए |
जालंधर। गुरुवार को दूसरी बार आईआईटी जेईई क्लियर करने वाले अमित-सुमित
की मदद के लिए देश-विदेश से कई लोग सामने आए हैं। इन दो भाइयों के पिता चाय की
रेहड़ी लगाते हैं।
चौगिट्टी चौक पर चाय बेचने वाले जितेंद्र कुमार के इन बेटों ने पिछले साल भी
आईआईटी निकाल दी थी मगर चार दिन में अस्सी हजार फीस जमा न कर पाने से उन्हें एडमिशन
नहीं मिला। इस बार शहर को भास्कर से इनकी कहानी पता चली तो लोग और संस्थाएं
चौगिट्टी पर इनके घर पहुंच गई। मदद भी तरह तरह से आई।
स्टेट बैंक से बिना ब्याज कर्ज
स्टेट बैंक के एजीएम सतीश कुमार वर्मा और राजीव वर्मा ने जहां खुद पैसे देकर इनके खाते खोले, वहीं इन्हें बिना ब्याज का एजूकेशन लोन देने का प्रपोजल भी बनाया।
मदद के बदले ट्यूशन
पीएनबी स्टाफर सतवीर सिंह का 20 हजार देने का वादा मगर खैरात न लगे इसलिए दोनों भाइयों से कहा मेरे बेटे को बीस दिन पढ़ा देना।
स्टेट बैंक के एजीएम सतीश कुमार वर्मा और राजीव वर्मा ने जहां खुद पैसे देकर इनके खाते खोले, वहीं इन्हें बिना ब्याज का एजूकेशन लोन देने का प्रपोजल भी बनाया।
मदद के बदले ट्यूशन
पीएनबी स्टाफर सतवीर सिंह का 20 हजार देने का वादा मगर खैरात न लगे इसलिए दोनों भाइयों से कहा मेरे बेटे को बीस दिन पढ़ा देना।
शिक्षा मंत्री डॉक्टर दलजीत चीमा ने अर्जी लेकर कहा सीएम से मदद कराऊंगा। वरना
खुद फीस दूंगा।
अमित और सुमित की कहानी पिछले साल अनसुनी ही रही। उन्हें तब आईआईटी खडग़पुर और
रुड़की में सीटें मिल गई थीं। मगर तब एडमिशन के लिए चार दिन मिले और चौगिट्टी चौक
पर चाय की रेहड़ी लगाने वाले पिता जितेंद्र कुमार फीस नहीं जुटा सके। बेटों ने
हिम्मत की। इस साल फिर बेहतर रैंक के साथ पास।
आईआईटी का एग्जाम सर पर था और पिता को मोटर साइकिल ने टक्कर मार दी।
अमित-सुमित ने हिम्मत नहीं हारी। पिता चल-फिर नहीं पा रहे थे। सो खुद ही चाय की
दुकान भी संभाली। खुद फैक्ट्रियों में सर्व करते। यह कहानी इन दो भाइयों की है,
जिन्होंने एक कमरे के घर में रहकर लगातार दूसरे साल आईआईटी क्लियर किया।
गुरुवार शहर के उन परिवारों के लिए बेइंतहा खुशियां लाया, जिनके बच्चे आईआईटी
में निकले। मगर अमृतसर बाईपास के चौगिट्टी चौक पर बीस साल से तिरपाल तानकर चाय की
दुकान चलाने वाले जितेंद्र कुमार रोजाना की तरह सुबह से शाम तक यहीं डटे रहे।
भास्कर के जर्नलिस्ट उनके पास पहुंचे तो वह आसपास की दुकानों और फैक्ट्रियों में
चाय बांटकर लौट रहे थे। पिछले साल भी बेटे आईआईटी में निकल गए थे मगर फीस नहीं भर
पाए। किसी ने कहा, फाइनांसरों से मिलो।
सूदखोरों की शर्तें सुनकर उन्होंने बेटों को दिलासा दिया - अगले साल देखेंगे।
साल बीता, बेटे फिर निकल गए हैं, मगर लद्देवाली के एक कमरे के किराये के घर में
रहने वाले जितेंद्र और उनकी पत्नी मंजू देवी की माली हालत वैसी ही है। इस साल फीस न
जुटाई तो आईआईटी के दरवाजे बंद ही रहेंगे। वह कहते हैं : ईश्वर की कृपा है, आगे भी
वही रास्ता दिखाएगा।
रैंकिंग
अमित
10वीं : 84%
12वीं : 86%
2013 : जेईई रैंक 1600 आईआईटी खडग़पुर
10वीं : 84%
12वीं : 86%
2013 : जेईई रैंक 1600 आईआईटी खडग़पुर
2014 : जेईई रैंक 2014
सुमित
10वीं : 70%
12वीं : 87.8%
2013 : जेईई रैंक 1800 आईआईटी रुड़की
2014: जेईई रैंक 809
10वीं : 70%
12वीं : 87.8%
2013 : जेईई रैंक 1800 आईआईटी रुड़की
2014: जेईई रैंक 809
जितेंद्र कुमार तीस साल पहले रोजी-रोटी जुटाने बिहार के सीतामढ़ी के शिवहर
गांव से यहां आए। रिक्शा चलाया, फिर आफिस ब्वाय की नौकरी की। बीस साल पहले बीएमसी
चौक की दिल्ली ऑटोमोबाइल कंपनी बंद हो गई तो फंड के पैसों से यह दुकान खोल ली।
बेटों को पढ़ाने लगे। आईआईटी क्या है, इसका उन्हें पता नहीं। मगर इतना जरूर जानते
हैं कि इसमें पढ़ाई सस्ती है। बेटे इंजीनियर बन गए तो जिंदगी बन जाएगी। छोटे सुमित
का 809 वां रैंक आया है। अमित का 2014वां रैंक।
ग्यारहवीं में आईआईटी के बारे में पता चला
लद्देवाली में सरकारी स्कूल बाल विद्या मंदिर में दसवीं तक पढ़े दोनों। सुमित
को ग्यारहवीं में अलास्का चौक के सरकारी स्कूल में दाखिला मिला तो बड़े अमित को
खालसा कॉलेजिएट स्कूल में।
ग्यारहवीं में आईआईटी के बारे में पता चला - इसमें पढ़ाई सस्ती है। प्लेसमेंट
अच्छे हैं। जिंदगी बन जाएगी। जी-जान से जुट गए। सुबह पांच बजे उठते। पूजा करने के
बाद सिर्फ पढ़ाई। दिन में स्कूल। शाम तक टीचर्स के पास मुफ्त कोचिंग। देर शाम को
पिता का हाथ बंटाना। खासकर उन दिनों में जब फैक्ट्री में चाय देकर आ रहे पिता एक
दिन बाइक की टक्कर से चोटिल हो गए। परीक्षा सर पर थी और दस-पंद्रह दिन उन्हें ही
चाय की दुकान चलानी पड़ी।
नहीं देखी आजतक कोई फिल्म
अमित अब बीस साल के हैं। सुमित 18 के। इन्होंने आजतक कोई फिल्म नहीं देखी है।
3ईडियट्स भी नहीं।
मां मंजूदेवी कहती हैं : न हमने कभी फिल्म देखी, न इन्होंने। बच्चे वही
तो करेंगे, जो मां-बाप चाहेंगे। खुशी है कि बेटे सही रास्ते पर हैं।
शुक्रगुजार होने का दिन
डॉ. माधवी ओबराय, जिनके इलाज से शादी के नौ साल बाद गोद भरी, मां मंजूदेवी
कहती हैं कि दिल्ली ऑटोमोबाइल्स में मैनेजर रहे न्यू जवाहर नगर के तिलकराज ओबराय का
वह सबसे पहले शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने अपनी डॉक्टर बहू डा. माधवी ओबराय से उनका
इलाज कराया।
कक्कड़ के शोरूम में जितेंद्र आफिस ब्वाय थे। शादी के नौ साल बाद 1994 में
अमित का जन्म हुआ। दो साल बाद सुमित का जन्म हुआ।
शर्मा और पाठक सर, जिन्होंने आईआईटी की मुफ्त तैयारी कराई
मॉडल टाउन में रहने वाले डीएवी कॉलेज अमृतसर में केमिस्ट्री के टीचर रवि शर्मा
ने उन्हें कोचिंग दी। पिछले साल आईआईटी मेंस निकाली तो अर्बन एस्टेट में विक्टरी
क्लासेज के केमिस्ट्री टीचर रंजन पाठक ने उनकी रैंकिंग देखकर एडवांस की तैयारी
कराई। इस साल भी जब चाहा, तब पढ़ाया।
उमेश, गुरविंदर और भूपिंदर सर जिन्होंने आईआईटी की राह दिखाई
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| उमेश, गुरविंदर और भूपिंदर सर |
बाल विद्या मंदिर में उमेश सर ने उन्हें आईआईटी के बारे में गाइड किया। फिर
गवर्नमेंट मॉडल स्कूल में फिजिक्स के भूपिंदर सर और संतनगर के मैथ्स टीचर गुरविंदर
ने उन्हें पढ़ाया।

